सस्ते दामों पर आम लोगों को पेट्रोल डीजल दिया जाता तो आम आदमी खुद देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर ले आता। ऐसा होता तो आज देश की अर्थव्यवस्था दौड़ रही होती। यह कहना भी अतिश्योक्ति न होगा कि सस्ता पेट्रोल-डीजल आम आदमी यानी उपभोक्ता को दिया जाये तो वो खुद ही देश की अर्थ व्यवस्था को दौड़ा लेगा।

नई दिल्ली। पूर्व केंद्रीय मंत्री और आईपीएल के पूर्व चेयरमेन राजीव शुक्ला ने कहा है कि मौजूदा केंद्रीय सरकार को देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के दो-दो मौके मिले, लेकिन सरकार इन दोनों अवसरों का उचित लाभ नहीं उठा सकी। उन्होंने कहा कि पेट्रोल डीजल के दाम बहुत नीचे आये थे। इन मौकों पर पेट्रोल-डीजल का भण्डार कर सस्ते दामों पर आम लोगों को पेट्रोल डीजल दिया जाता तो आम आदमी खुद देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर ले आता। ऐसा होता तो आज देश की अर्थव्यवस्था दौड़ रही होती। यह कहना भी अतिश्योक्ति न होगा कि सस्ता पेट्रोल-डीजल आम आदमी यानी उपभोक्ता को दिया जाये तो वो खुद ही देश की अर्थ व्यवस्था को दौड़ा लेगा।

दरअसल, पेट्रोल और डीजल अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है। लेकिन आमतौर पर इसे सरकार की रीढ़ की हड्डी का दर्जा मिल जाता है। कोरोना महामारी का पैर बिना रुके पसर रहा है। केन्द्र सरकार और राज्य सरकारें इस महामारी के खिलाफ लड़ाई को प्राथमिकता दे रहे हैं। प्राथमिकता जायज है। स्वाभाविक भी। इस महामारी के बीच अर्थव्यवस्था को अनुप्रासंगिक नुकसान (Collateral Damage) पहुंचना भी स्वाभाविक है।

महामारी के इस वैश्विक संकट के बीच देश की अर्थव्यवस्था को उस कंप्यूटर की तरह बंद कर दिया गया है, जिस पर बड़े वायरस का हमला हुआ हो। खास बात है कि किसी कंप्यूटर को एंटी वायरस की नामौजूदगी में वायरस हमले से बचाने के लिए पावर शटडाउन कर देना एक कारगर कदम है। फिर प्राथमिक उपचार के लिए सुरक्षित मोड (Safe Mode) में उसे रीस्टार्ट कर वायरस से लड़ा जाता है।

अब इसे इत्तेफाक कह लीजिए या मौजूदा सरकार की अच्छी किस्मत। उसे लगातार दो बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक ऐसा मौका मिला, जब वह सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था को दौड़ा सकती थी। पहली बार, सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान साल 2016 से 2018 के दौरान। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था को तेज रफ्तार देने की थी। वहीं वैश्विक स्तर पर आर्थिक मंदी के 2009 जैसे संकेत साफ थे।

सरकार को राहत के तौर पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़ी सौगात मिली। कच्चे तेल की कीमतें 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल के उच्च स्तर से लुढ़ककर 20-30 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। वहीं इस कार्यकाल में अर्थव्यवस्था नोटबंदी और जीएसटी के दोहरे झटके को भी झेल रही थी। इस सौगात के जरिए केन्द्र सरकार के खजाने को भरने और तेल कंपनियों के पुराने नुकसान की भरपाई करने का काम किया गया। वहीं इस दौरान दुनिया के एक बड़े कच्चे तेल उपभोक्ता चीन ने सस्ती दरों पर ज्यादा से ज्यादा कच्चे तेल के भंडारण का काम किया।

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह समेत कई अर्थशास्त्रियों ने सरकार को बार-बार चेताया कि आर्थिक सुस्ती के दौर में कच्चे तेल की गिर रही कीमतों का सीधा फायदा उपभोक्ताओं को दिया जाए। इस मत के पीछे तर्क था कि देश में पेट्रोल और डीजल की कीमत कम रखने से सामान्य उपभोक्ता की जेब में अधिक पैसा बचेगा।

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